आखिर ऐसा क्यों है:क्या जम्मू कश्मीर में सुरक्षा के प्रतिबंध इतने सख्त हैं कि इंसाफ के लिए हाईकोर्ट तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है

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लेखक अली इशरत

आखिर ऐसा क्यों है ?
क्या जम्मू और कश्मीर में सुरक्षा के प्रतिबन्ध इतने सख्त हैं कि इन्साफ के लिए हाईकोर्ट तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है . 17 सितम्बर को सुप्रीमकोर्ट में राष्ट्रीय बाल आयोग कि पहली अध्यक्ष रहीं शांता और बाल अधिकार कार्यकर्ती इनाक्षी
गंगोली कि याचिका में इंडियन एक्सप्रेस , टेलेग्राफ़ , कारवां तथा वाशिंगटन पोस्ट में छपी खबर / रिपोर्ट का हवाला दिया गया है . . इंडियन एक्सप्रेस कि 8 अगस्त कि रिपोर्ट है कि 17 सल का एक लड़का क्रिकेट खेल रहा था जब CRPF के जवानों ने इसको पकड़ने के लिए पीछा किया तो वह नदी में कूद गया और नदी में डूबकर मर गया . 9 अगस्त कि वाशिंगटन पोस्ट कि रिपोर्ट है कि सौरा में रात को छापे पड़ रहे थे और स्कूल जाने वाले बच्चों और मर्दों को पुलिस ले जाने लगी और बच्चों कि मां से कहा कि अगर बच्चों और पतियों को छुडाना है तो बच्चों को लेकर थाने आ जाएँ . टेलेग्राफ़ कि 14 अगस्त कि रिपोर्ट है कि पाम्पोर में एक नाबालिग लड़के को छ दिनों तक हिरासत में रखा गया और जब वह लौट कर वापस अपने घर गया तो उस बच्चे ने बताया कि उससे भी कम उम्र के बच्चे जेल / हिरासत में हैं .

याचिका में इस तरह के कई उदाहरण हैं जिसे सुनकर चीफ जस्टिस ने याचिका कर्ता से कहा कि जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते ? तो जवाब में बताया गया कि सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण हाईकोर्ट तक पहुंचना मुश्किल है इस पर चीफ जस्टिस नाराज़ हो गए और यह कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है . हम जम्मू कश्मीर के चीफ जस्टिस से बात करेंगे और रिपोर्ट भी लेंगे . अगर ज़रूरी हुआ तो खुद भी जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट जायेंगे . चीफ जस्टिस ने बाल अधिकार कार्यकर्ती हुजेफी से कहा कि यदि बात गलत निकली तो अंजाम भुगतने को तैयार रहें .सुप्रीमकोर्ट में जम्मू कश्मीर को लेकर अलग अलग मामलों में सुनवाई चीफ जस्टिस कि कोर्ट में चल रही थी .जहां उनकी बेंच है . बहस के दौरान कश्मीर टाईम्स कि एडीटर अनुराधा भसीन ने कहा कि इंटरनेट और संचार माध्यम 43 दिनों से ठप्प है तो सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि जमू कश्मीर में अखबार तो छप ही रहे हैं ,

तब कोर्ट ने पूछा कि कि संचार व्यवस्था चालू नहीं है आखिर ऐसा क्यों है कि संचार व्यवस्था चालू नहीं हो रही है ? इस पर अटार्नी जनरल ने कहा कि मीडिया के लोग संचार व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें दूर दराज़ के इलाके में जाने कि इजाज़त भी है . सरकार कि तरफ से दलील दी गयी कि पत्थार्बजों को मदद मिल रही है और सीमा पार के आतंकवादियों को भी . केंद्र सरकार ने अपनी दलील दी कि किस वजह से संचार व्यवस्था ठप्प है जवाब में कहा गया कि श्रीनगर में मोबाईल फोन ठप्प है , इंटरनेट ठप्प है , इसे शुरू किया जाना चाहिए . इंडियन युनियन जर्नलिस्ट की अनुराधा भसीन भी इस याचिका से अपने को जोड़ना चाहती हैं . अनुराधा भसीन कि वकील वृदा करात ग्रोवर ने कहा कि हमें नहीं पता कि किस कानून के तहत सूचना व्यवस्था ठप्प की गयी है आपात काल के लिए भी संसद से मंज़ूरी लेनी पड़ती है वरना 30 दिन के भीतर वह लैप्स /LAPS हो जाती है . इस मामले में तो 40 दिन से भी अधिक हो गया है . फारूक अब्दुल्लाह पर PSA / जनसुरक्षा कानून लगा दिया गया है . इस कानून के तहत दो वर्षों तक बिना किसी सुनवाई या मुक़दमें के हिरासत में रखा जा सकता है . यह जनसुरक्षा कानून उस दिन लगा जिस दिन सुप्रीमकोर्ट में अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने वाले मामले कि सुनवाई होने वाली थी . 83 साल के फारूक अब्दुल्लाह पर लोक व्यवस्था में व्यवधान डालने का आरोप लगाया गया है इसके लिए तीन महीने के लिए हिरासत में रखा जा सकता है . फारूक अब्दुल्लाह अभी तक नज़रबंद थे अब उन्हें जेल जिस जगह पर हैं उसे जेल का दर्ज़ा दिया जा सकता है . फारूक अब्दुल्लाह सहित सैकड़ों नेता नज़रबंद हैं या हिरासत में हैं .

6 अगस्त को सांसद सुप्रिया सुले ने लोक सभा में कहा था कि फारूक अब्दुल्लाह सदन में नहीं हैं तो अमित शाह ने कहा था कि उन्हें न तो हिरासत में लिया गया है और न ही गिरफ्तार किया गया है , वे अपनी मर्ज़ी से अपने घर पर हैं . . मुख्यधारा के किसी नेता के खिलाफ पहली बार जनसुरक्षा कानून लगा है . खासकर तीन बार मुख्य मंत्री रहे और मौजूदा सांसद पर . आम तौर पर यह जनसुरक्षा कानून आतंकवादियों या अलगाववादियों पर लगता है या फिर पत्थर बाजों पर .
नीता शर्मा ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि संयुक्त राष्ट्र कि आम सभा होनी है  आम सभा में वहां कश्मीर का ज़िक्र होगा . इससे पहले आकर आलोचना कर सकते हैं जिससे सरकार कि स्थिति अजीब हो सकती है .राज्य सभा सांसद वाईको ने ही एक याचिका दायर कि थी कि फारूक अब्दुल्लाह को छोड़ा जाए ताकि वह चेन्नई के कार्यक्रम में शामिल हो सकें . . इस पर सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र को नोटिस भेजा है .कई राजनितिक दलों के नेताओं ने फारूक अब्दुल्लाह पर जनसुरक्षा कानून लगाए जाने कि निंदा की है .
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योजना आयोग की पूर्व सदस्य एवं प्रसिद्ध शिक्षाविद् सईदा हमीद के नेतृत्व में गये पांच महिला कार्यकर्ताओं की टीम ने दावा किया है कि “जम्मू-कश्मीर में संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने के बाद वहां 51 दिन बीतने पर भी हालात बहुत बुरे हैं और लोग सेना के खौफ के साये में जी रहे हैं तथा 13 हज़ार बच्चे गायब हो गये हैं और कई
वकील विभिन्न जेलों में बंद कर दिए गये हैं।”

एक खबर के अनुसार पांच महिला कार्यकर्ताओं की टीम ने 17 सितम्बर से 21 दिनों तक कश्मीर के तीन जिलों में 17 गांवों का दौरा करने के बाद अपनी जांच रिपोर्ट जारी करते हुए यह दावा किया। इस टीम में नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन की महासचिव अन्नी राजा, प्रगतिशील महिला संगठन की महासचिव पूनम कौशिक, पंजाब विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर कँवल जीत कौर तथा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोध छात्र पंखुड़ी जहीर ने पत्रकारों से बातचीत में जम्मू-कश्मीर की स्थिति का आँखों देखा हाल बयान किया और कहा कि गत 51 दिन बीत जाने के बाद स्थिति सामान्य होने के कोई आसार नहीं है और सरकार के सब दावे झूठे हैं क्योंकि मीडिया पर सेंसरशिप जैसी स्थिति है, इसलिए सच सामने नहीं आ रहा है .

शोपियां, पुलवामा और बांदीपुरा जिले का दौरा कर लौटी इन महिलाओं ने बताया कि लोग सेना के खौफ में जी रहे हैं क्योंकि सेना के लोग उन पर अत्याचार कर रहे हैं और उनका दमन कर रहे हैं। रात आठ बजते ही सबको अपने घरों की रोशनी बुझा देनी पड़ती है और दुकान, कालेज से लेकर पूरा शहर बंद पड़ा है। परिवहन एवं संचार
व्यवस्था जिससे लोगों के आर्थिक हालत बहुत ख़राब हो गये हैं।मुस्लिम विमेंस फोरम के सईदा हमीद ने कहा कि वे लोग वहां से दुखी दिल से लौटे हैं और दिल खून के आंसू रोता है,पूरा शहर खामोश है, दुकानें खुलती नहीं फसलें बर्बाद
हो गयी हैं, सेब भी खत्म हो गये हैं और 10-12 वर्ष से लेकर 22-24 साल के 13 हज़ार लड़के गायब हो गए हैं और उनके घर वालों को पता नहीं कि सेना के जवान उनके बच्चों को कहाँ ले गये हैं। पेशे से वकील पूनम कौशिक ने कहा कि जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के दफ्तर पर ताला लगा हुआ है और वकीलों को पीपुल्स सिक्यूरिटी कानून में गिरफ्तार कर आगरा, जालंधर, फरीदाबाद की जेलों में कैद कर रखा गया है और उनके घर वालों को बताया नहीं जा रहा कि वे किस जेल में हैं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की महिला संगठन से जुड़ी श्रीमती अन्नी राजा ने कहा कि उनकी टीम ने किसानों, वकीलों, डाक्टरों, नर्सों, स्कूल-कालेज के छात्रों तथा प्रोफेसरों और गृहणियों से भी मुलाकात की। सबका कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार ने छल किया है और सेना उन पर अत्याचार तथा दमन कर रही है। लोगों के मन में सेना को लेकर
काफी क्रोध है।इन महिला कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तार लोगों को तत्काल रिहा करने की झूठी प्राथमिकी रद्द करने स्थिति सामान्य करने संचार व्यवस्था बहाल करने और सेना के दमन की जांच कराने तथा अनुच्छेद 370 को बहाल करने की मांग की है। इससे पहले सुरक्षा बलों द्वारा कश्मीर में बच्चों को उठाये जाने के सम्बन्ध में मीडिया में 3 सितम्बर ‘2019 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि कैसे कश्मीर में रात को छापे मार कर बच्चों को उठाया जा रहा है।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि , कश्मीर की झूठी तस्वीर पेश कर रही मोदी सरकार, सब कुछ ठीक तो फिर कर्फ्यू
क्यों ?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा कि – कश्मीर अतिसंवेदनशील मुद्दा, इसका समाधान वाजपेयी के फार्मूले पर ही होना चाहिए कर्तव्य चेतना से लगभग गायब है और उन्माद में तो कोइ संयम या विवेक होता ही नहीं . और यदि उस पर सत्ता के संरक्षण में एक के बाद एक उन्माद भड़काने के प्रयास होते रहे हो तो
इस तरह के विवेक कि मांग भी देशद्रोह बन जाती है . जिस विचार या कार्य में सत्ता कि आलोचना कि गंध भी आती है तो उसे देशद्रोह घोषित करने के लिए बहुत ही उद्दत गिरोह सक्रीय हो जाते हैं और इस राष्ट्रवाद कि तह में साम्प्रदायिकता कि गहरी पैठ है . इससे पनपी साम्प्रदायिकता का सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह का प्रयोग कर जनता का अनुकूलन किया गया है . एक योजनाबद्ध ढंग से मुसलामानों को देशद्रोह का प्रतीक बना दिया गया है और कश्मीर का मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होना सोने पर सुहागा हो गया है . कश्मीर में मुसलामानों का अधिसंख्यक होना और वहां उपस्थित आतंकवाद ने मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण और राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाना आसान हो गया . और हुआ भी यही . जनता देश के लिए बेरोज़गारी को सहने के लिए और देश कि स्वंभू अखंडता के लिए मंदी को अनदेखा करने को तैयार हैं जिसमें टीवी
चैनलों का भी बहुत बड़ा योगदान शामिल है .

एक तरफ तो नोट्बंदी के दुष्परिणाम अर्थव्यवस्था को गिरावट की और खींच रहे थे , जीएसटी , बेरोज़गारी पिछले 40-45 सालों के निम्न स्तर पर , निर्माण , विनिर्माण , वाहन , यातायात होटल, बैंकिंग , बेतहाशा निजीकरण के विरुद्ध रेल और आयुध निर्माण कर्मचारी संघर्ष और आर्थिक संकट इत्यादि से जनता का ध्यान हटाने का प्रयास तो दूसरी तरफ देश भर में मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण , कश्मीर की धारा 370 ने दोनों लक्ष्य सिद्ध कर दिए . देश कि तमाम पार्टियों द्वारादेशभक्ति को अपने एजेंडे में शामिल न करना भाजपा को आक्सीजन दे गया . वहीं भाजपा ने इसे सांप्रदायिक रंग देते हुए अपने राष्ट्रवाद में ढाल लिया जोकि वास्तव में एक छदम ही है जबकि कोइ भी राष्ट्रवाद देश को सामजिक स्तर पर विभाजित करके राष्ट्रीय एकता का लक्ष्य प्राप्त ही नहीं कर सकता , लेकिन मोदी है तो सब मुमकिन है . अब तो
यह भी कहा जा रहा है कि भूखंड को मिला लिया और आबादी को गवां दिया . वरना लगभग दो महीने से एक पूरे क्षेत्र को कर्फ्यू में रखना किसी भी तरह से तर्क सांगत नहीं हो सकता है .जनसंचार के माध्यम तक बंद हैं . जिसका अंदाज़ा लगाना बहुत ही मुश्किल है जो कश्मीर किजनता झेल रही है . इसके बाद भी क्या आशा कि जा सकती है कि इस तरह के त्रासद अनुभव से कश्मीरी अवाम भारत से जुड़ेगी ? जो कश्मीरी कल तक हमारे देश के एक अंग थे आज वह
फिर बेगाना सा महसूस कर रहा है . आज वहां कि स्थिति तो ऐसी है कि कश्मीर से बाहर रहने वाले कश्मीरियों को अपने घर परिवार वालों का समाचार पाने के लिए तरस रहे हैं या फिर कुछ लोग सुप्रीमकोर्ट का चक्कर काट रहे हैं .
सत्ता के खेल भी निराले होते हैं जनाब . जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाने और दो केंद्र शासित प्रदेश के निर्माण के बाद ऐसा जताया जा रहा है कि मानो किसी और देश पर भारत ने कब्जा कर लिया है अर्थात जैसे कल तक जम्मू कश्मीर भारत से अलग कोइ कोइ राष्ट्र था और आज पहली बार उसे भारत का अंग बनाया गया है . जिस प्रकार से मध्यकालीन युग में हमलावर देश किसी देश / प्रदेश को जीतते थे तो जीतने के बाद वहां लूट मचा देते थे ,

महिलाओं का हरण करते थे , उसी तरह इतना भयानक कोहराम मचा कि देश के बहुत से गैर सांप्रदायिक समूहों ने चेतावनी तक दे डाली कि यह सब बहुत ही अनुचित है यह बात और है कि सत्ता पक्ष अंत तक मूक दर्शक ही बना रहा . दुःख तो इस बात का है कि सत्ता दल के विधायकों , सांसदों व मंत्रियों तक ने इस तरह के बेहूदे कमेंट्स किये जैसे अब कश्मीर कि सारी गोरी लड़कियां व महिलायें इनके और इनके कार्यकर्ताओं का वरण कर लेंगी और संघ के कुंवारों
का तप सफल हो जायेगा और सारे प्रापर्टी डीलर वहां का संकट ख़तम करने के लिए वहां कि ज़मीन खरीदने के सपने देखने लगे . आज स्थिति तो यह कर दी गयी है कश्मीरियों के दुःख दर्द पर बात करना भी राष्ट्रद्रोह हो गया है . यह कितनी अजीब और गिरी हूए बात है कि धारा 370 के हटाये जाने कि घोषणा के फ़ौरन बाद ही कश्मीरी लड़कियों को और समाज को अपमानित करने के बयांन आने लगे . जिस पर तमाम राजनितिक पार्टियों के नेताओं व समाज सेवियों ने भाजपा नेताओं और नेत्रियों के बयानों कि कड़ी निंदा की . धारा 370 हटाये जाने के बाद तो भाजपाईयों के ऐसे ऐसे बयांन आने लगे जैसे कोइ अपने संस्कार पेश कर रहा हो . भाजपाई भूल गए कि जम्मू कश्मीर भी अपने ही देश का हिस्सा है , अफ़सोस तो इस बात का है भाजपा के एक मुख्य मंत्री तक ने ऐसे घृणित बयान दिए . देश के चारों ओर से यह भी मांग उठी कि आखिर विकास के लिए इस धारा को हटाने कि क्या ज़रुरत थी . क्या बन्दूक के साए में वहां के लोगों कि ज़मीने छीन कर विकास किया जायेगा . यही नहीं पूरे जम्मू कश्मीर में धारा 144 का लागू करना , इंटरनेट , मोबाइल सेवायें बंद कर देना किसी को उचित नहीं लगा
.

बहुमत के नशे में चूर सरकार ने किसी भी मानवीय परिणामों कि चिंता नहीं कि है , उसने तो सांप्रदायिक मुद्दों के आधार पर ध्रुवीकरण का अभियान पिछले कई वर्षों से चलाया है . इस ध्रुवीकरण के लिए म़ाब लिंचिंग / भीड़ हिंसा को राजनितिक हथियार बना दिया है . कश्मीर को भी उसने इसी ध्रुवीकरण के रूप में इस्तेमाल किया , लेकिन कश्मीरियों के भीतर दमित असंतोष कि कुलबुलाहट के बारे में कभी नहीं सोचा गया . हम आशा करते हैं कि कश्मीरी सरकार कि
स्वार्थपरता कि राजनीति से प्रभावित न होकर अपनी महान देशभक्ति के अनुरूप ही काम करेंगे

नोट:ये लेख लेखक की निजी विचार व लेखक दोवारा इकत्रित की गई जानकारी पर है इस लेख को वर्ल्ड मीडिया टाइम्स ने बिना एडिट करे प्रकाशित किया है 

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