क्या आपके बेटे को ‘पब्जी’ का नशा तो नहीं,तो यह खबर आपके लिए जरूर

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पब्जी गेम का नाम तो आपने भी सुना होगा। सावधान रहें, कहीं आपका बेटा इस गेम की गिरफ्त में तो नहीं है? यदि है, तो सतर्क हो जाएं और उसे इस गेम से दूर रहने के उपाय करिए। यह गेम पढ़ाई तो खराब कर ही रहा है बच्चों को मानसिक रोगी भी बना रहा है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को लेकर डॉक्टर के पास पहुंच रहे हैं। डॉक्टर की ओपीडी में आने वाले कुछ ऐसे भी लोग हैं जो 15 घंटे से अधिक पब्जी खेलते हैं।

केस एक 
शहर की रहने वाली एक छात्रा पिछले पांच माह से पब्जी गेम खेलने की आदी हो गई। हारने पर वह गुस्सा होने लगी। एक दिन ऐसा आया कि हारने पर उसने सुसाइड का प्रयास किया। अभिभावक काल्विन अस्पताल में मनोचिकित्सक से मिले। मनोचिकित्सक अब उसे उसकी असली दुनिया में लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

केस दो 
प्रतापगढ़ के दो सगे भाई मोबाइल से पब्जी गेम खेलते हैं। आपस में ही कम्पटीशन करते हैं। 10 से 20 घंटे प्रतिदिन गेम खेलते थे। पिता एसआइ हैं। उन्हें पता चला तो मनोचिकित्सक से संपर्क किया। अब दोनों भाई अब पांच घंटे ही गेम खेलते हैं। डॉक्टर कहते हैं कि धीरे-धीरे यह पूरी तरह से इस गेम से दूरी बना लेंगे।

क्या है इसका इलाज
मोतीलाल नेहरू मंडलीय अस्पताल के डॉ. मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान कहते हैं कि पब्जी गेम की लत में जो भी पड़ जाता है, वह उस गेम के बिना नहीं रह सकता। कितनी भी भीड़ में हो, वह उसी गेम में लगा रहता है। इसके इलाज के लिए दो ऑप्शन होते हैं। एक साइको थेरेपी व दूसरा फार्मा थेरेपी। साइको थेरेपी के जरिए हम संबंधित व्यक्ति को व्यवहारिक रूप से ठीक करने का प्रयास करते हैं। ज्यादा खेलने वालों को फार्मा थेरेपी के जरिए ठीक किया जाता है।

क्या है पब्जी गेम
इस गेम को लोग मोबाइल या कंप्यूटर से खेल सकते हैं। इस गेम को अकेले, दो लोग या चार लोग एक साथ भी खेल सकते हैं। सबसे पहले 100 प्लेयर्स को एक आइलैंड पर भेज दिया जाता है। सभी प्लेयर एक एरोप्लेन में होते हैं। उन्हें एरोप्लेन से पैराशूट के जरिए नीचे उतरना होता है और इसमें दूसरे प्लेयर्स को मारना होता है, वह भी खुद को सुरक्षित रखते हुए। जो आखिरी प्लेयर बचता है वह विनर बनता है। यह एक तरह का मिशन गेम है।

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