जानिए:ये है ‘कुतिया देवी’ का मंदिर,किसलिए रोज होती है पूजा

0
866

kutiya-03_1446033619झांसी. सूखे की मार सबसे ज्यादा बुलंदेलखंड पर पड़ती है। यहां की जमीन दो बूंद बारिश के लिए तरस जाती है। भूख और प्यास की वजह से यहां कई लोग दम तोड़ देते हैं। झांसी के मऊरानीपुर का दर्द भी इससे जुदा नहीं है। इस गांव के कुछ लोग जहां ऊपर वाले से दुआ करते हैं कि किसी की मौत भूख से न हो तो वहीं कुछ एक कुतिया के मंदिर में सिर झुकाते हैं।यहां महिलाएं रोज पूजा करने आती हैं और भजन भी गाती हैं। गांव के लोग उसकी पूजा करके मूर्ति पर जल भी चढ़ाते हैं।

मूर्ति स्थापित कर बनाया मंदिर 
मऊरानीपुर के रेवन गांव में सड़क के किनारे काले रंग की कुतिया की मूर्ति स्थापित करके छोटा सा मंदिर बनाया गया है। ये मंदिर एक चबूतरे के ऊपर है। इसे देखकर हर कोई चौंक जाता है कि आखिर यहां किसी कुतिया का मंदिर क्यों बनाया गया है। इसके पीछे की कहानी पूरे बुंदेलखंड का दर्द बयां करती हैं। रेवन गांव की शांति देवी बताती हैं कि कुतिया का मंदिर यहां के लोगों की आस्था का केंद्र है। कुतिया महारानी उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं। पिछले कई सालों से यहां इसकी पूजा की जा रही है। कई गांवों के लोग इस मंदिर में पूजा करने आते हैं। दशहरा और दीवाली पर यहां की पूजा का खास महत्व है।

kutiya-01_1446033617क्या हैं मंदिर बनने के पीछे की कहानी?
रेवन गांव के पास ही एक और ककवारा गांव है। दोनों गांवों के बीच में ये मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि एक कुतिया इन दोनों गांवों में रहती थी। गांव के किसी भी कार्यक्रम में वो खाना खाने पहुंच जाती थी। लोग भी उसे बेहद प्यार करते थे और खाना खिलाते थे। एक बार कुतिया दोनों गांव के बीच में थी। तभी रेवन गांव से रमतूला (किसी कार्यक्रम में खाना खाने की सूचना के लिए बजाया जाने वाला यंत्र) बजने की आवाज आई। आवाज सुनते ही कुतिया खाना खाने के लिए गांव में पहुंच गई, लेकिन देर हो जाने की वजह से सब खाना खाकर उठ गए। तभी ककवारा गांव से रमतूला बजा। कुतिया खाना खाने के लिए वहां भी दौड़ गई, लेकिन खाना नहीं मिला।

पत्थर में बदल गई दफनाने वाली जगह
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कुतिया बीमार थी। दौड़ते-दौड़ते थककर दोनों गांव के बीच में बैठ गई। भूख और बीमारी की वजह से उसने वहीं दम तोड़ दिया. गांव के लोगों ने कुतिया को उसी जगह पर दफना दिया। जिस जगह उसे दफनाया गया, वो स्थान पत्थर में तब्दील हो गया। लोगों ने इस चमत्कार को देखने के बाद वहां छोटा सा मंदिर बना दिया। कुछ साल बाद वहां पर उसकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी। ककवारा गांव की कटरी देवी बताती हैं कि आने वाली दीवाली पर यहां धूमधाम से पूजा-अर्चना की जाती है, क्योंकि उसकी मौत इन्हीं दिनों में हुई थी। यहां मांगने से हर मुराद पूरी हो जाती है।