स्लाटर हाऊस वैध और अवैध ?:अली इशरत

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इलाहाबाद: समाजवादी पार्टी की सरकार में प्रचलित वैध स्लाटर हाऊस को उत्तर प्रदेश में भाजपा की आई नई सरकार ने वैध स्लाटर हाऊसों को अवैध घोषित कर स्लाटर हाऊसों को बंद कर दिया जिससे अल्प्संख्यक मुसलामानों को कठिनाईयां तो हूई ही , लाखों मुसलमान बेरोजगार भी हो गया है .

अवैध स्लाटर हाऊसों पर प्रतिबन्ध के बाद प्रशासन कि ओर से मीट कारोबारियों के लिए नई  गाइड लाइन  जारी  की गयी है जिसे देख कर कारोबारियों में निराशा के साथ खलबली भी मच गयी है . मीट का कारोबार करना , आने वाले समय में काफी मुश्किल होने जा रहा है . ऐसे कई नए मानक हैं जिसकी जानकारी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने मीट के कारोबारियों को भेजा है . नई  गाइडलाइन  के अनुसार इन  दुकानों को बहुत सारा कागज़ी काम भी निपटाना होगा . कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि मीट बेचने के लिए ज़रूरी ढांचा गत सुविधाओं कि लिस्ट इतनी लम्बी – चौड़ी है   की    अधिकतर दुकानों  के लिए इसका पालन नामुमकिन /असंभव है और वे स्थाई तौर पर बंद हो जाएँगी . इस नए कानून के बारे में कहा जा रहा है  की एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट कि और से जारी आदेशों का तो पालन करना ही पड़ेगा . इस  गाइड लाइन  में कुल सत्रह शर्तें कही गयी हैं इन सभी शर्तों का अनुपालन कराने के लिए सरकार और प्रशासन दोनों ही प्रतिबद्ध हैं .

मीट  (गोश्त /मांस)  किदूकान धार्मिक स्थलों की परिधि से  50 मीटर कि दूरी पर होगी साथ ही साथ धार्मिक स्थल  के मुख्यद्दार से उनकी दूरी 100 मीटर होगी  2- सब्जी की दूकान के पास मीट की  दूकान नहीं होगी . 3 – जानवरों या पक्षियों को दूकान के अन्दर नहीं काट सकते  4- मीट की  दूकान पर काम करने वालों का हेल्थ सर्टिफिकेट  अनिवार्य होगा  5 –मीट कि कवालिटी को पशु चिकित्सक से प्रमाणित कराना होगा . 6 – शहरी इलाकों में लाइसेंस के लिए पहले सर्किल आफिसर , फिर नगर निगम की इजाज़त होगी फिर खाद्य विभाग से  T & D  एडमिनिस्ट्रेशन से एनओसी लेनी होगी .  7 –ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत , सर्किल आफिसर और  FSDA  से एनओसी लेनी  होगी .  8 –  बीमार या प्रिगनेंट जानवरों को काटने कि मनाही होगी  9 –हर छ  महीने पर दूकान कि सफेदी करानी  होगी  10 –चाकू और दुसरे हथियार स्टील के बने होने चाहिए . 11 –मीट की दुकानों में कूड़े के निपटारे के लिए समुचित व्यवस्था होनी चाहिए . 12 –स्लाटर हाऊस से खरीदे जाने वाले मीट का पूरा हिसाब–किताब भी रखना  होगा . 13 –मीट को इंसुलेटेड फ्रीज़र वाली गाड़ियों में ही स्लाटर हाऊस से ढोया जाएगा . 14 –मीट को जिस फ्रिज में रखा जाएगा उसके दरवाज़े पारदर्शी होने चाहिए . 15 –सभी मीट की दुकानों पर गीज़र भी होना ज़रूरी  है . 16  –  दुकानों के बाहर परदे या गहरे रंग के  ग्लास लगाए जायेंगे  ता कि लोगों कि निगाह न पड़े . 17 – FSDA के किसी मानक का उल्लंघन होते ही लाइसेंस तुरंत रद्द कर दिया जायेगा .

वर्तमान में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  के अनुसार प्रदूषण धारक तथ्यों के  उपस्थित होने के कारण बूचड़ खानों / स्लाटर हाऊस को मानकों के विपरीत पाया  गया  . नए स्लाटर हाऊस बनानेके लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेकर निर्मित किये जाते हैं .सरकारों द्दारा संचालित व् प्रचलित स्लाटर हाऊस  में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  के मानक नहीं हैं , जिसके सम्बन्ध में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   ने उत्तर प्रदेश राज्य को अवगत कराया था . पिछली सरकार /समाजवादी  पार्टी  सरकार के द्दारा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   के मानकों कि अनदेखी करते हुए उ.प्र.की  सरकार द्दारा स्लाटर हाऊस को जारी रखा गया . तत्पश्चात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में इस सन्दर्भ में एक याचिका प्रस्तुत  की  . एनजीटी ने राज्य सरकार से पुनः इन स्लाटर हाऊस को बंद करने के आदेश दिए . इसके बाद राज्य सरकार (समाजवादी पार्टी कि सरकार)   ने   स्लाटर हाऊस को संचालित करने वाले नगर निगम व् नगर महापालिकाओं को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   कि आपत्तियों के सन्दर्भ में अपने स्थानीय अभियंताओं  की  एक कमेटी गठित कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   कि सिफारिशों को खारिज कर दिया . प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  द्दारा स्लाटर हाऊस को प्रतिबंधित किये जाने कि सिफारिशों के बावजूद तत्कालीन सरकार ने स्लाटर हाऊस को बंद करने  में कोइ विशेष दिलचस्पी न लेकर स्लाटर हाऊसों को पूर्व कि भाँ ति चालू रखा  . इसी सन्दर्भ में 2015 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल  की  गयी जिसमें इस बात को प्रबल रूप से उठाया गया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड   की  सिफारिशों पर एनजीटी के निर्णय के बाद भी स्लाटर हाऊस पूर्व कि भाँ ति चल रहे हैं . इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के नगर विकास सचिव को न्यायालय में उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने के आदेश दिए .

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में समाजवादी  पार्टी  की  सरकार  के नगर विकास सचिव ने आनन् फानन में नगर पालिका व् नगर निगमों द्दारा संचालित स्लाटर हाऊसों को बंद करने के आदेश दे दिए . नगर विकास सचिव के आदेश के अनुपालन में सम्बंधित अधिकारियों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डद्दारा इंगित राज्य सरकार के स्लाटर हाऊसों को सील  बंद कर दिया . यह घटना सन 2016 कि है जब प्रदेश में अखिलेश यादव के नेत्रित्व में समाजवादी पार्टी  कि  सरकार चल रही  थी . इसके बावजूद कोइ भी युक्ति  संगत   एवं समाधान पूर्वक हल का प्रयास नहीं किया गया जबकि स्लाटर हाऊस के  पुनर्निर्माण के जीर्णोधार  की ज़िम्मेदारी पूर्ण रूप से उ.प्र. सरकार  कि ही  थी इसके बावजूद समाजवादी पार्टी  की सरकार ने कोइ कार्रवाई नहीं की . इस योजना (स्लाटर हाऊसों के जीर्णोधार ) के अनुरूप केंद्र सरकार द्दारा अनुदानित राशि राज्य सरकार के माध्यम से नगर निगम व् नगर महा पालिकाओं को प्राप्त हो चुकी थी . उ.प्र. में सत्ता परिवर्तन के फ़ौरन बाद वर्तमान भाजपा सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के सन्दर्भ में पुनः प्रक्रिया को प्रारम्भ करते हुए स्लाटर हाऊसों में रोक के आदेश का अनुपालन कराया है अन्यथा इस सन्दर्भ में कोइ भी अन्य आदेश नहीं दिया  है . यहाँ पर यह अवगत कराना अति आवश्यक है कि स्लाटर हाऊसों के निर्माण व् जीर्णोधार कि ज़िम्मेदारी वर्तमान या पिछली सरकार  की  ही है जिसे जनहित में संवैधानिक रूप से शीघ्र ही किया जाना चाहिए .

राष्ट्रीय स्वं सेवक संघ और उसके सह संघटनों का हिन्दू कट्टरवाद , अज्ञानता , कोरी भावुकता और अंध विशवास पर टिका हुआ है , लेकिन संघ प्रचारक श्री नरेंद्र मोदी  की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को अपने हित में भुनाने  के लिए पूंजीपतियों ने अब हिन्दू कट्टरवाद पर अपना शिकंजा  कस लिया है और श्री मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद भाजपा को जिस उदारता से पूंजीपतियों  का सहयोग और समर्थन मिल रहा है , उसका लाभ भी भाजपा उठा रही है . अति हिन्दू कट्टरवाद  की  विचारधारा को पूंजीपति अब आधुनिकता  और प्रगतिशीलता का  पुट  देते हुए अपने कारोबार को फैलाने के लिए उपयो ग कर रहे हैं .

उत्तर प्रदेश में अवैध स्लाटर हाऊसों को बंद करने के फैसले के बाद मीट कारोबार और उससे जुडी हिन्दू भावनाओं तथा साम्प्रदायिकता पर बहस को एक नया मोड़ पूंजीवादियों द्दारा प्रायोजित कथित विचारकों ,  बुद्धिजी वियों  ने दिया है . यह सही है  की जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता लेकिन भारत में में जो व्यवस्था है उसके तहत केवल मीट  ही नहीं  , साग, सब्जी, मिठाईयां , दूध ,मावा ,पनीर  दही और अनाज से बनी अनेक खाद्य सामाग्रियां , सभी सरकार द्दारा सार्वजनिक बिक्री के लिए निर्धारित मापदंडों पर खरी नहीं  उतरती हैं . हमारा देश मिलावट के लिए बदनाम है जिस देश में और प्रदेश में आक्सीटोसिन जैसा ज़हरीला प्रतिबंधित इंजेक्शन धड़ल्ले से  दुधारू जानवरों को लगा कर अधिकतम दूध निकाल कर बेचा जा रहा  है साथ ही साथ यही इंजेक्शन सब्जियों और फलों में भी इस्तेमाल किया जा रहा हो वहां पर वैध स्लाटर हाऊसों को अवैध कहकर बंद करना कहाँ तक सही है ? सोचने कि बात है . ( अभी कुछ दिनों पूर्व समाजवादी की सरकार में यही सलातर हाऊस वैध थे और अब इस भाजपा सरकार के आने के फ़ौरन बाद  यह अवैध कैसे हो गए )  .     महानगरों से लेकर गाँव – कस्बों तक बाजारों में बिकने वाली तमाम खाद्य सामग्रियां स्वच्छ और स्वास्थ्य वातावरण में नहीं बेचीं जाती हैं . . गंदे नालों के किनारे बाज़ार लगते हैं और कई जगह तो गन्दी नाली और शौचालयों के पास ही खाद्य पदार्थ बेचे और खरीदे जाते हैं , लेकिन– गरीबी और सब कुछ चलता है –  की उदारता वाले हम भारतीय इसे सहन करते आये हैं . अपने देश में खाद्य पदार्थों का 80 फीसदी कारोबार असंगठित और अति सूक्ष्म स्तर का है . लेकिन पूँजीवाद के इस वैश्विक दौर में अब पूंजीपति गिरोह इस कारोबार को भी हडपने में लगे हैं .  मीट  की दुकानों पर व् कच्चे माल पर  जिस प्रकार से हिन्दू कट्टरपंथी संगठन हमला बोल रहे हैं और दुकानों को बंद कराने के लिए कारोबारियों पर दबाव बना रहे हैं वह चिंता का विषय है .

अपने प्रदेश में कहीं भी लाइसेंस धारी स्लाटर हाऊस नहीं हैं , कहीं हैं भी तो मानक पूरे न होने के कारण वह भी बंद हो गए हैं . गैर कानूनी स्लाटर हाऊसों के बंद हो जाने के कारण रेस्टोरेंट , होटल और क्लब चलाने वालों को कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है . चाहे घरेलू खपत हो या होटलों में मांग ,  उपभोक्ता तो परेशान   है . छोटे दुकानदार , से लेकर बकरी और मुर्गा पालन वाले भी परेशान और हलाकान हैं . भैंसों व् बकरों  की  कटान रुकने से मुर्गा , मछली कि बिक्री पर भी असर पडा है . दुकानदारों के साथ मजदूर भी परेशान हैं . नौबत यह आ गयी कि स्वास्थ्य मंत्री उ. प्र. को सफाई देनी पड़ी कि मुर्गा और मछली  की  बिक्री पर रोक नहीं है .   इंसान तो  इंसान जानवर भी स्लाटर हाऊसों के बंद होने से परेशान हो गए हैं  . यहाँ पर यह भी अवगत कराना अति  आवश्यक है कि प्रदेश में स्लाटर बंद होने के बाद प्रदेश में ही स्थित चिड़िया घरों में रहने वाले मांसाहारी जानवरों को मांस कहाँ से मिल रहा है ? यह भी सोचने का विषय है . यदि जानवरों के लिए कोइ आल्टरनेट व्यवस्था है तो क्या इंसानों के लिए यह व्यवस्था नहीं कि जा सकती है ?  सरकार द्दारा स्लाटर हाऊसों  पर  पावर ब्रेक के बाद सब्जियों के आसमान छूने लगे हैं . गरीब तबके द्दारा मीट – मछली  खरीद  कर अपना पेट भरता था जिससे सब्जियों के दामों में कमी रहती थी .

उत्तर प्रदेश में स्लाटर हाऊसों के बंद होने के बाद भारत के मीट निर्यात में गिरावट  की  आशंका बढ़ गयी है . भारत से होने वाले मीट निर्यात (भैंस मीट ) में अपने  प्रदेश   की  हिस्सेदारी लगभग  35 फीसदी है . वाणिज्य और  उद्योग मंत्रालय के तहत काम करने वाले कृषि व् प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण  ( एपीडा ) के अनुसार मीट के उत्पादन  का काम मुख्य रूप से उ.प्र. , आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र और पंजाब में किया जाता है . पिछले वित्त वर्ष में भारत ने लगभग 26.6 हज़ार करोड़ रूपये के मीट का निर्यात किया था . एपीडा  के अनुसार भारत से वियतनाम , मलेशिया , मिश्र , सऊदी अरब व् इराक जैसे देशों में मुख्य रूप से मीट का निर्यात किया जाता है .  सरकारी आंकड़ों के अनुसार विश्व में होने वाले कुल मीट  (भैन्स) निर्यात में भारत  की हिस्सेदारी लगभग  43 फीसदी है . इसी कारण बीफ / मीट निर्यात में भारत को दुनिया का किंग कहा जाता है .

अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में योगी सरकार ने एक बयान में कहा कि — प्रदेश में संचालित अवैध पशु वधशालाओं / स्लाटर हाऊसों को बंद कराना एवं यांत्रिक स्लाटर हाऊसों  पर प्रतिबन्ध वर्तमान सरकार कि प्राथमिकताओं में है . इस मसले पर आल इंडिया मीट एंड लाइव स्टाक एक्सपोर्टर्स  एसोसियेशन   का कहना है कि अवैध स्लाटर हाऊसों को बंद किये जाने का क़दम तो ठीक है लेकिन जहां तक लाइसेंसी यांत्रिक स्लाटर हाऊसों को बंद को बंद करने के भाजपा के चुनाव घोषणापत्र के  वादे पर अमल करने का सवाल है तो यह केंद्र में इसी पार्टी  की  नीतियों के प्रति विरोधाभाषी क़दम होगा . एसो सियेशन ने ज़रुरत पड़ने पर इसे अदालत में चुनौती देने कि भी बात कही है .  एसो सियेशन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार केंद्र  की  भाजपा सरकार ने  स्लाटर हाऊसों को  बाकायदा एक उद्यग का दर्जा दे रखा है . सरकार का खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय यांत्रिक स्लाटर हाऊसों कि स्थापना के लिए 50 फीसदी तक अनुदान देकर इसे प्रोत्साहित करता है , वहीं उत्तर प्रदेश  की  सरकार इस पर पाबंदी लगाने कि बात करती है .

देश कि मीडिया में पिछले कुछ दिनों से अवैध स्लाटर हाऊसों को लेकर चर्चा ज़ोरों पर है . उत्तर प्रदेश में भाजपा कि सरकार   बनने के बाद तो देश में चलने वाले तमाम स्लाटर हाऊसों पर कार्रवाई होने के बाद से मीडिया में सबसे ज्यादा टी आर पी स्लाटर  हाऊसों  की  ख़बरों  को मिल  रही है . प्रदेश में योगी कि सरकार आने के बाद से स्लाटर हाऊसों पर गाज गिरनी शुरू हो गयी है . योगी  की  राह पर भाजपा शासित प्रदेशों में भी स्लाटर हाऊसों पर कार्रवाई शुरू हो गयी है . सरकार के अनुसार स्लाटर हाऊस समाज और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हैं . इसी लिए स्लाटर हाऊसों पर कार्रवाई कि जा रही है लेकिन इन कार्रवाई के बीच केंद्र और राज्य सरकारें इन वैध और अवैध स्लाटर हाऊ स  की  असली हकीकत छुपा रही है . एग्रीकल्चर एंड प्रासेस्ड  फ़ूड एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथारिटी ( अपेडा  ) के अनुसार इस  समय देश में चार हज़ार से अधिक स्लाटर हाऊस  रजिस्टर्ड  हैं वहीं देश भर में लगभग 25 हज़ार से अधिक स्लाटर हाऊस बिना अनुमति के चल रहे हैं .  अपेडा के अनुसार बीफ और मांस / मीट निर्यात करने के लिए स्लाटर हाऊसों को सिर्फ 95 नियमों और मानकों को पूरा करना आवश्यक है . इसके अतरिक्त प्रिवेंशन आफ  क्रूवल्टी  टू एनिमल्स (स्लाटर हाऊस ) रूल्स 2001 के अनुसार भी 50 से अधिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है . राज्य व् केंद्र  की  विभिन्न एजेंसियों के भी अलग अलग नियम और कानून हैं . देश में  स्थानीत निकाय से  लेकर केंद्र सरकार तक करीब एक  दर्ज़न विभागों से स्लाटर हाऊस  खोलने के लिए अनुमति लेनी ज़रूरी होती है . इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के दोहरे मापदंड का भी खुलासा होता है . जिन बाहर के देशों में मीट निर्यात किया जाता है उस मीट को लेकर केंद्र सरकार और राज्य  सरकार   सख्त होती है . ऐसे मीट को केवल 95 मापदंडों से गुज़रना होता है . इस निर्यात से सरकार को करोड़ों/अरबों  रूपये  की  विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है . इस कारण मीट निर्यात को लेकर सरकारें कुछ नहीं  बोलतीं  , लेकिन जिस मीट को देश में खाने के लिए बाज़ार में बेचा जाता है उस मीट को लेकर सरकार हमेशा आँख बंद कर लेती है  . किसी भी स्लाटर हाऊस को खोलने के लिए लगभग एक  दर्ज़न विभागों से अनुमति लेना और उनकी शर्तों को मानना पड़ता है . अवैध तो अवैध देश में जो वैध स्लाटर हाऊस हैं उनमें से चुनिन्दा ही हैं जो इन पैमानों पर खरे उतर सकते हैं क्योंकि सरकार के विभिन्न विभागों से अनुमति लेना ही सबसे बड़ी अड़चन होती है इसके बाद इतने सख्त नियमों को लागू करने के लिए मोटी रक़म  होनी चाहिए तब जाकर स्लाटर हाऊस चालू हो सकता है . सरकारी आंकड़ों कि यदि माने तो देश में इस समय लगभग 25 हज़ार अवैध स्लाटर हाऊस नियमों को ताक पर रख कर कार्य कर रहे हैं .

देश में कितनी तादाद में अवैध स्लाटर  हाऊस चल रहे हैं इसे एक आरटीआई के जवाब से पता किया जा सकता है .  एक आर टी आई के जवाब के अनुसार अरुणाचल प्रदेश , चंडीगढ़ , दादर व् नगर हवेली , दमन व् दीव , मिजोरम , नागालैंड , सिक्किम व् त्रिपुरा में एक भी स्लाटर हाऊस खाद्द्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं . इसके अतिरिक्त चौंकाने वाला खुलासा यह है कि आठों राज्यों में ऐसा एक भी स्लाटर हाऊस नहीं है जिसने केन्द्रीय या राज्य   स्तरीय लाइसेंस ले रखा हो . ऍफ़एसएस आई के अनुसार तमिलनाडु में 425 , मध्य प्रदेश में 262  तथा महाराष्ट्र में 249 स्लाटर हाऊस रजिस्टर्ड हैं अर्थात देश के कुल 55 फीसदी स्लाटर हाऊस केवल इन्हीं तीन सूबों में चल रहे हैं .  अपने प्रदेश में केवल  58 स्लाटर हाऊस  रजिस्टर्ड हैं .  ऍफ़एसएस आई के मुताबिक देश भर में 162 स्लाटर हाऊस को प्रदेश स्तरीय और 117 स्लाटर हाऊस को केन्द्रीय लाइसेंस प्राप्त है . पेटा तो देश भर में लगभग 30 हज़ार से ज्यादा अवैध स्लाटर हाऊस चलाये जाने कि बात करती है

विष्यवसनीय सूत्रों पर यदि भरोसा करें तो जानकारी होती है कि मीट निर्यात करने वाले 90 फीसदी से अधिक गैर मुस्लिम हैं . दूसरा यह कि यदि स्लाटर हाऊस को अवैध घोषित कर बंद ही करना था तो बंद करने से पहले जनता के लिए कोइ आल्टरनेट व्यवस्था आवश्यक थी . सरकार ने एकतरफा फैसला लेकर स्लाटर हाऊसों को  तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया . इस धंधे में लाखों करोड़ों लोगों कि रोज़ी रोटी चलती है

यह लेखक की निजी प्रतिकिर्या है इससे वर्ल्ड मीडिया टाइम्स चैनल का इस लेख से कोई संबंद नही

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